Sunday, December 22, 2013

वो तुलसी का पौधा.....

घर के बरामदे में उग गया ख़ामख़ा,
वो तुलसी का पौधा
पत्थरों की कठोर दरारों से झाँकता,
वो तुलसी का पौधा

मदमस्त वो ज़िन्दगी से भरा,
खुद कि हिफाजत को सिपाहियों सा खड़ा
एक दिन मुझसे रूबरू हो गया
वो तुलसी का पौधा

जिस दिन मुलाक़ात का इकरार था
उसको मेरा इंतज़ार था
ठहरा शायद तभी तो इतने दिन
बरामदे में अपनी जड़े फैलाये
मेरी पहली नज़र को भांप गया
वो तुलसी का पौधा

ध्यान न दिया उसपर इतने दिन
औरकों सा पलट दिया
कपडे सुखाते सुखाते बरामदे में
मुखालफत की आँखों से कह गया उस दिन
बस यूँही मुलाक़ात कर गया
वो तुलसी का पौधा   

Monday, November 4, 2013

हर पल कल कल, अकेला हूँ मैं.............

हर पल कल कल 
अकेला हूँ मैं
झर झर हाला 
बहाता हूँ मैं 
कथन मनन भरम से ऊपर 
अपनी मूरत बनाता हूँ मैं 
तोड़ता उसको बारम्बार 
खोया खुद को बारम्बार 
ज्वाला सी पल पल
जलाता हूँ मैं 
उम्मीदों की किरणें दिखेगी बेहतर 
ऐसे पुल क्यों बनाता हूँ मैं 

हर पल कल कल 
अकेला हूँ मैं
झर झर हाला 
बहाता हूँ मैं 
बिंदु वही है 
शून्य के जैसा 
शून्य वही है 
सुराखों के जैसा 
सुराखों की दरारें मिटाता हूँ मैं 
गेहरी और गहन है 
अटल और विरल है 
बहुत ही कटु है 
फिर भी वो कहानी सुनाता हूँ मैं 

हर पल कल कल 
अकेला हूँ मैं
झर झर हाला 
बहाता हूँ मैं
बरस के तो हलके
होते हैं बादल 
बादल से हलके 
होते हैं वो जल 
जल से लथ पथ 
वो कागज़ के पुर्ज़े 
रोज़ उठ उठ के जलाता हूँ मैं 
जल के भी जो
ना होते हैं ठंडे 
तर्पण कहाँ से 
करूँ उनको जल मैं 
सुलग रहे हैं अब भी कहीं जो 
अर्पण क्यों कर दूँ तुम्हे मैं 

हर पल कल कल 
अकेला हूँ मैं
झर झर हाला 
बहाता हूँ मैं.,







Wednesday, February 27, 2013

मन मेरे क्यूँ नहीं है तू...........

मन मेरे क्यूँ नहीं है तू
उस अबोध बालक सा।
क्यों नहीं तेरी आशाएं, इच्छाएँ
उस जैसी।
क्यों नहीं निष्पाप ही तू
उसकी तरह खेलता, बोलता
क्यों नहीं तू उसकी ही तरह सब से मिलता।
क्यों नहीं अब बिना जाने, बिना बूझे
तू आगे बढ़ता
क्यों अब बार बार तू
निष्कर्षों को तोलता।।

क्यों नहीं तू अब बादलों को देखकर
आकृतियाँ सोचकर खिलखिलाता।
क्यों नहीं आज भी तू नदियों में अपनी
नावों को टहलाता।
क्यों आज तुझे एक दरख़्त
मात्र जरिया ही दिखाई पड़ते।
क्यों आज तुझे कुएं के बोल
चीख से सुनाई पड़ते।
क्यों नहीं आज मिटटी के घर
तुझे महलों का सुख देते।
क्यों नहीं आज तेरे कपड़े
बेवजह मैले होते।

कहाँ गयी तेरी मुस्कान
कहाँ छोड़ आया तू उसे।
अकेला रह गया है तू
उसने तो देखे ऐसे कई मेले।
मन तेरी तुतली भाषा ही मुझे प्यारी थी
इस भोलेपन के आगे ही मेरी
कामनाएं हारी थी।
कितना सरल, कितना तरल
था वो मन
कितना कोमल फाये सा
तू भी तो ऐसा ही था
कई बरसों पहले
क्यों हो गए है आज तेरे
सारे रंग काले नीले।।


मन मेरे क्यूँ नहीं है तू......

Sunday, January 20, 2013

वो रात.....................

कुछ रातें मैंने ख़राब कर दी,
कुछ रातें किस्मत ने।
जिस दिन ख़राब रात में जज़्बात उड़े,
उस दिन नीदों ने भी मुझसे दुश्मनी कर ली।

ख़राब रात ने उस दिन ज़िन्दगी को ख़राब कर दिया,
जिस दिन उसने कागजों का मुंह देख लिया।
कागजों मे छपे अंकों ने जिस दिन ख़राब रात का मोल कर दिया।

सिलवटें भी ना समेट पायी जिस शिकन को,
ना बयाँ कर पायी अन्दर की सिलवटों को,
वो पहली ख़राब रात ने अपने अन्दर सब कुछ समेट लिया।

वो आँखें अब ख़राब आँखों में शामिल हो गयीं,
वो हस्ती अब ख़राब हस्तियों में,
वो ख़राब रात ने रातों रात मेरा हुलिया बदल दिया।

उस रात के बाद मेरा नाम कुछ और था,
उस रात के बाद मेरी मंजिलों का रास्ता कुछ और था।
वो रात हसीं थी बस मेरी मजबूरियां कुछ और थी,
वो बेहद खुबसूरत रात शायद बस मेरे लिए ही ख़राब थी।

Saturday, January 5, 2013

वो गुंचा क्यारी का थक हार के सो गया.............

गुंचा मुरझाया फिर से एक,
फिर से एक बगीचा अधुरा हो गया।
क्यारी की शान वो गुंचा,
फिर से अकेला हो गया।

पानी की बूंदों सा निष्पाप,
मिटटी की सुगंध सा तेज़,
मन के भावों सा चंचल,
वो गुंचा था जैसे हलचल।

गिरा मिटटी में, गन्दा हुआ,
खिलने की उम्मीद में लेकिन खड़ा हुआ।
भवरों के डर ने उसे फिर मिटटी में मिला दिया,
वो गुंचा क्यारी का थक हार  के सो गया।